ECI के फैसलों पर 14 आपत्तियां क्यों उठीं और राहुल गांधी ने क्या आरोप लगाए?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्तों ने SIR, वोटर रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने और डेटाबेस से जुड़े फैसलों पर 10 महीनों में 14 लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इसके बाद राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और ‘वोट चोरी’ के आरोप दोहराए, जबकि ECI ने फैसले सर्वसम्मति से होने की बात कही।
Gyanesh Kumar Controversy - मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, वोटर डेटाबेस तक अधिकारियों की पहुंच और SIR से जुड़े मामलों में अपील की प्रक्रिया जैसे मुद्दों पर थीं। रिपोर्ट सामने आने के एक दिन बाद चुनाव आयोग ने कहा कि इस तरह की लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-व्यवस्था किसी बहुसदस्यीय संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं और पिछले एक साल में आयोग ने जो भी महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं, वे पूरी कमिशन की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
इसके बाद 24 सितंबर को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने करीब 55 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस पूरे विवाद को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर और आगे बढ़ाया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और ‘वोट चोरी’ के अपने पुराने आरोपों को फिर दोहराया। राहुल ने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है और इसके लिए उन्होंने ज्ञानेश कुमार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी गंभीर आरोप लगाए। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें चुनाव आयोग और भाजपा ने स्वीकार नहीं किया है।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी का हमला
राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत में सरकारों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया रही है। उन्होंने 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि लोकप्रिय सरकारों के खिलाफ भी कुछ समय बाद एंटी-इनकंबेंसी आती है। इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा के मामले में उन्हें ऐसी स्थिति क्यों नहीं दिखाई देती। राहुल ने इसका कारण चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी को बताया।

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि उन्होंने ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय चयन प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई थी। 2025 में उन्होंने SIR और वोटर लिस्ट को लेकर कई बार चुनाव आयोग पर सवाल उठाए थे। अगस्त 2025 में उन्होंने बिहार SIR और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों को लेकर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया था। सितंबर 2025 में भी उन्होंने वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। चुनाव आयोग ने उस समय उनके आरोपों को गलत और निराधार बताया था और उनसे आरोपों के समर्थन में एफिडेविट देने या उन्हें वापस लेने को कहा था।
इस बार राहुल गांधी ने कहा कि वोट, कानून, संस्थाओं और संविधान के बीच की कड़ी कमजोर हो गई है। उन्होंने कहा कि पहले चुनावी सिस्टम को ठीक करना जरूरी है और उसके बाद कथित गड़बड़ियों की जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट हैं और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर मिलकर काम करेंगे। ये राहुल गांधी के दावे और राजनीतिक रुख हैं, न कि किसी अदालत या चुनाव आयोग का निष्कर्ष।
14 आपत्तियों में आखिर मुद्दा क्या था?
द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की पड़ताल के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं। इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। रिपोर्ट ने इन आपत्तियों को चुनाव आयोग के कामकाज के चार महत्वपूर्ण हिस्सों से जोड़ा - नए वोटरों का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और बहाल करना, पश्चिम बंगाल में कुछ अपीलों की प्रक्रिया और वोटर डेटाबेस के संचालन तथा सुरक्षा से जुड़े सवाल।रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ ऐसे फैसलों पर सवाल उठाए जिन्हें उनके अनुसार उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिया गया था। एक मामले में संधू ने आयोग की कार्रवाई को ‘अनधिकृत और गैरकानूनी’ बताया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद में दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी रोल के IT सिस्टम से जुड़े काम के बंटवारे को लेकर कैबिनेट सेक्रेटरी को अलग-अलग पत्र लिखे। उनके अनुसार काम के बंटवारे में ऐसे बदलाव किए गए थे, जिनसे चुनावी रोल के IT सिस्टम पर एक स्तर की निगरानी कम हो गई थी।
इसके बाद 9 सितंबर को तीनों चुनाव आयुक्तों की पूरी बैठक हुई। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, यह चार महीने बाद हुई पहली पूर्ण बैठक थी। हालांकि बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई।

Form-6 से लेकर वोटर डेटाबेस तक सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में नए वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में एक नया सवाल जोड़ा गया। इसमें आवेदक से पूछा जाने लगा कि क्या उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली वोटर लिस्ट में था। रिपोर्ट के मुताबिक इस सवाल का जवाब दिए बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ सकता था।इस बदलाव पर विवेक जोशी ने मई में फाइल पर आपत्ति दर्ज की थी। उनका कहना था कि नियमों में बदलाव किए बिना Form-6 में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। संधू ने भी इस राय से सहमति जताई थी। इसके बावजूद बदलाव किया गया। बाद में द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद 13 अगस्त को संधू ने इसे ‘अनधिकृत और गैरकानूनी’ बताते हुए इसे तुरंत हटाने की बात कही।
दूसरा बड़ा सवाल वोटर डेटाबेस तक पहुंच को लेकर था। चुनाव आयोग की व्यवस्था में वोटर लिस्ट तैयार करने की जिम्मेदारी विधानसभा क्षेत्र के Electoral Registration Officer यानी ERO की होती है। ERO एक वैधानिक अधिकारी होता है और आम तौर पर यह जिम्मेदारी SDM लेवल के अधिकारी के पास होती है। वोटर रोल का डिजिटल रिकॉर्ड पहले ERONet और बाद में ECINet जैसे सिस्टम पर रखा गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने मई 2026 में वोटर डेटाबेस के ‘धीरे-धीरे केंद्रीकरण’ पर चिंता जताई और ऑडिट कराने का सुझाव दिया, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वोटर डेटाबेस में बदलाव करने की अनुमति केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो। अगस्त में संधू ने भी राज्य स्तर के अधिकारियों की ओर से ERONet तक पूरी पहुंच नहीं होने की शिकायतों का हवाला दिया।
पश्चिम बंगाल में 38 लाख अपीलों का सवाल
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद और ज्यादा गंभीर रहा। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में SIR की प्रक्रिया के अंतिम हिस्से में करीब 60 लाख ऐसे वोटरों के मामलों पर न्यायिक अधिकारियों को सुनवाई करने को कहा था, जिनके रिकॉर्ड में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ बताई गई थी। बाद में करीब 27 लाख वोटरों के नाम हटाए गए।सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन मामलों में अपील सुनने के लिए रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल बनाए गए। हाल में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इन ट्रिब्यूनल के सामने करीब 38.31 लाख अपीलें लंबित थीं। इनमें 22.21 लाख अपीलें हटाए गए वोटरों ने नाम दोबारा जोड़ने के लिए दाखिल की थीं, जबकि 16.10 लाख अपीलें उन वोटरों के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था और जिनके नाम हटाने की मांग की गई थी।
यहीं पर संधू ने सवाल उठाया कि आयोग की ओर से इन करीब 16 लाख अपीलों को दाखिल करने की अनुमति किसने दी और इन्हें वास्तव में किसने दाखिल किया। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, संधू ने अधिकारियों से यह भी पूछा कि इस प्रक्रिया की जानकारी उन्हें, विवेक जोशी या पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्य निर्वाचन अधिकारी को क्यों नहीं थी।
यहां एक जरूरी तथ्य यह भी है कि SIR और वोटर डिलीशन को लेकर राजनीतिक विवाद को सीधे चुनाव परिणामों से जोड़ना अलग सवाल है। पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों में 49 सीटों पर SIR के तहत हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी, लेकिन इन 49 सीटों में भाजपा ने 26 और TMC ने 21 सीटें जीती थीं। इसलिए केवल इस आंकड़े से किसी चुनाव परिणाम में SIR की वजह से गड़बड़ी साबित नहीं होती। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि चुनाव परिणाम पर SIR की भूमिका का कोई प्रमाण नहीं मिला था।
गोवा में 97 वोटरों का मामला
गोवा का मामला वोटर डेटाबेस और सॉफ्टवेयर से जुड़ी आपत्तियों का एक उदाहरण बनकर सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को निर्देश दिया था कि SIR के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाले वोटरों को दस्तावेज देने और अंतिम वोटर लिस्ट से पहले अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का मतलब ऐसे रिकॉर्ड से था, जिसमें सॉफ्टवेयर किसी वोटर के मौजूदा रिकॉर्ड को पुराने रिकॉर्ड में उसके माता-पिता या किसी रिश्तेदार से जोड़ते समय नाम या उम्र जैसी जानकारी में असंगति दिखाता था।
रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में EROs ने ऐसे मामलों की सुनवाई की और दस्तावेज देखने के बाद 97 वोटरों को अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल करने के योग्य पाया। लेकिन सॉफ्टवेयर में उस फैसले को दर्ज करने और पहले हटाए गए नामों को वापस जोड़ने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच इस समस्या के समाधान के लिए वरिष्ठ चुनाव अधिकारी को आठ बार लिखा और IT विभाग को भी इसकी प्रतियां भेजीं। रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम वोटर लिस्ट जारी होने तक जरूरी तकनीकी बदलाव नहीं हुआ और वे 97 वोटर अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके।
चुनाव आयोग ने 14 आपत्तियों पर क्या जवाब दिया?
चुनाव आयोग ने 23 सितंबर को जारी अपने आधिकारिक बयान में इन घटनाओं को आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा बताया। आयोग ने कहा कि वह अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों और स्थापित संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत काम करने वाली बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है। उसके मुताबिक लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक चेक एंड बैलेंस पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने की सामान्य प्रक्रिया हैं।आयोग ने कहा कि किसी प्रस्ताव के ड्राफ्ट चरण में सदस्यों की ओर से सवाल या सुझाव देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। अलग-अलग राय अंतिम फैसला होने से पहले विचार-विमर्श का हिस्सा होती हैं। आयोग ने यह भी कहा कि केवल तीन चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए सुझाव दे सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण जवाब यह था कि आयोग ने पिछले एक साल में लिए गए अपने सभी फैसलों को पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिया गया बताया। आयोग के अनुसार, इस दौरान करीब 40 नई पहल शुरू की गईं, कई चुनावी सुधार किए गए और देशभर में वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण, जिसमें SIR भी शामिल है, कराया गया। आयोग ने बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने का भी उल्लेख किया।
वोटर डेटाबेस को लेकर आयोग ने कहा कि ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। अनधिकृत बदलाव रोकने के लिए IT सिक्योरिटी चेक और ऑडिट कंट्रोल लागू हैं। आयोग ने यह भी कहा कि ERO और DEO जैसे वैधानिक अधिकारी कानून के तहत वोटरों के रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने की प्रक्रिया में अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि, आयोग के इस बयान में Form-6 में बदलाव और गोवा के 97 वोटरों जैसे प्रत्येक विशिष्ट मामले का अलग-अलग जवाब नहीं दिया गया। इसलिए विवाद में एक तरफ द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दर्ज विशिष्ट आपत्तियां हैं और दूसरी तरफ आयोग का व्यापक संस्थागत जवाब है कि ये टिप्पणियां सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा थीं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
कानून में आयोग के फैसलों की प्रक्रिया क्या है?
CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से जुड़े 2023 के कानून की धारा 18 के मुताबिक आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। अगर CEC और चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर अलग राय रखते हैं, तो मामला बहुमत की राय से तय होता है। इसी प्रावधान में आयोग को अपनी प्रक्रिया और काम के बंटवारे का अधिकार दिया गया है, लेकिन इसके लिए सर्वसम्मत निर्णय की बात कही गई है।द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने अप्रैल 2026 में आयोग के अधिकारियों को इसी कानूनी प्रक्रिया की याद दिलाई थी। संधू ने 16 अप्रैल को कहा था कि ECI के नाम से कई संचार ऐसे जारी हो रहे हैं, जिन्हें आयोग की मंजूरी नहीं मिली है। इसके आठ दिन बाद जोशी ने भी इसी तरह की आपत्ति दर्ज की और भविष्य के आधिकारिक संचार के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी बताई।
BJP और विपक्ष आमने - सामने
इस विवाद के बाद भाजपा ने चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय को सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया बताया। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के एंटी-इनकंबेंसी वाले तर्क पर भी सवाल उठाया और अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि एंटी-इनकंबेंसी को केवल भाजपा के संदर्भ में अलग तरीके से नहीं देखा जा सकता। भाजपा ने आयोग की निर्णय प्रक्रिया को कानूनी और बहुमत आधारित बताया है।वहीं विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज कर दी है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल पहले भी उनके खिलाफ हटाने के नोटिस दे चुके हैं। अप्रैल 2026 में 73 राज्यसभा सांसदों ने नौ आरोपों के आधार पर नया नोटिस दिया था। इससे पहले मार्च में लोकसभा और राज्यसभा में हटाने की कोशिश हुई थी, जिसे दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने अप्रैल में खारिज कर दिया था।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने आयोग के कामकाज और उसकी स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए। AAP के अरविंद केजरीवाल ने भी पूछा कि अगर वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने का अधिकार ERO के पास है तो दिल्ली से पूरे देश के वोटर डेटाबेस के संचालन का सवाल कैसे उठता है। ये विपक्षी नेताओं के राजनीतिक आरोप और सवाल हैं, जिन पर चुनाव आयोग का व्यापक जवाब यह है कि वैधानिक अधिकारी कानून के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं।
चुनाव आयोग में मतभेद पहली बार नहीं
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का इतिहास नया नहीं है। 1993 में दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बाद आयोग बहुसदस्यीय हुआ और तत्कालीन CEC टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 14 जुलाई 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को बरकरार रखा। उस दौर में शेषन और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों और आयोग के कामकाज को लेकर विवाद सामने आए थे।2009 में तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी। गोपालस्वामी ने चावला पर पक्षपात का आरोप लगाया था। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सरकार की सलाह पर यह सिफारिश स्वीकार नहीं की और चावला बाद में CEC बने।
2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े कुछ Model Code of Conduct मामलों में आयोग की बहुमत राय से अलग मत रखा था। लवासा चाहते थे कि उनकी असहमति को अंतिम आदेशों में दर्ज किया जाए। आयोग ने 2:1 के फैसले में तय किया कि असहमति अंतिम आदेश में सार्वजनिक नहीं होगी, लेकिन उसे रिकॉर्ड में रखा जा सकता है। इसके बाद लवासा ने कुछ MCC बैठकों से खुद को अलग कर लिया था।
मौजूदा विवाद की खास बात यह है कि यहां सवाल सिर्फ किसी एक फैसले पर अलग राय का नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने 10 महीनों में 14 लिखित आपत्तियों को नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट, डेटाबेस और SIR की प्रक्रिया से जोड़ा है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग इन आपत्तियों को अंतिम फैसलों से अलग बताते हुए कह रहा है कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से हुए। इसलिए इस विवाद का केंद्र अब यही है कि रिकॉर्ड में दर्ज इन आपत्तियों का अंतिम फैसलों और आयोग के कामकाज पर वास्तविक असर क्या था।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Rahul Gandhi ने ECI पर ‘Vote Chori’ का आरोप क्यों लगाया है?
राहुल गांधी का आरोप है कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा SIR के जरिए चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया गया है। उन्होंने हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में द इंडियन एक्सप्रेस की 14 आपत्तियों वाली रिपोर्ट को भी अपने आरोपों के संदर्भ में उठाया और CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। हालांकि, ये राहुल गांधी के आरोप हैं और चुनाव आयोग ने वोट चोरी के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। आयोग का कहना है कि उसके सभी फैसले कानून और आयोग की प्रक्रिया के अनुसार हुए हैं।
ECI में 14 objections किस मुद्दे को लेकर उठाए गए थे?
द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 14 लिखित आपत्तियां नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन, Form-6 में बदलाव, वोटर लिस्ट से नाम हटाने और बहाल करने, पश्चिम बंगाल में अपील दाखिल करने की प्रक्रिया और वोटर डेटाबेस तथा IT सिस्टम तक अधिकारियों की पहुंच जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।
Gyanesh Kumar को लेकर Rahul Gandhi की क्या आपत्तियां हैं?
राहुल गांधी का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग ने वोटरों के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं की और चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हुई। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और उनके खिलाफ जांच की बात कही। राहुल ने यह भी कहा कि उन्होंने उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पर पहले ही आपत्ति जताई थी। ये राजनीतिक आरोप हैं; चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को कानून के अनुरूप और सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।
Election Commission ने 14 objections पर क्या जवाब दिया?
चुनाव आयोग ने कहा कि लिखित नोट, तकनीकी सुझाव, टिप्पणियां और आंतरिक चेक एंड बैलेंस सामान्य संस्थागत प्रक्रिया हैं। आयोग के मुताबिक, अलग-अलग राय अंतिम निर्णय से पहले होने वाले विचार-विमर्श का हिस्सा होती हैं। आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में लिए गए उसके सभी महत्वपूर्ण फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं और ECINet जैसे डिजिटल सिस्टम सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं।
BJP ने Rahul Gandhi के Vote Chori claim पर क्या कहा?
भाजपा ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने उनके एंटी-इनकंबेंसी वाले तर्क पर सवाल उठाते हुए अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस के चुनावी इतिहास का हवाला दिया। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया कानून के तहत चलती है और आयोग में अलग-अलग राय आना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है।